अंतरराष्ट्रीय

इसराइली एयर डिफ़ेंस को भेदने वाले ईरान के सस्ते और सटीक ड्रोन: भारत क्या सबक ले सकता है?

इसराइली एयर डिफ़ेंस को भेदने वाले ईरान के सस्ते और सटीक ड्रोन: भारत क्या सबक ले सकता है?

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू होने के बाद पश्चिम एशिया में तबाही मचाने और जटिल रूप से तैयार किए गए एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में ईरान के कम लागत वाले कामिकाज़े शाहेद ड्रोन काफ़ी कारगर साबित हुए हैं. इन ड्रोन्स ने आधुनिक युद्ध और उसके आर्थिक समीकरणों में युद्ध का एक नया आयाम जोड़ दिया है.

ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ, अपने शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल पूरे पश्चिम एशिया में सेंसरों, राडारों, सैन्य ठिकानों, तेल गैस के बुनियादी ढांचों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और रिहायशी इलाकों को आक्रामक तरीके से निशाना बनाने के लिए किया है.

पिछले एक महीने में खाड़ी क्षेत्र में फैली अराजकता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन और वायु शक्ति की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है. 2022 में रूस यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह सैन्य सिद्धांत, हर जगह अपनाया जा रहा है.

शाहेद ड्रोन से हुआ भारी नुक़सान इस बात को उजागर करता है कि कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन को बड़े पैमाने पर सैन्य हथियारों के जखीरे में शामिल करने का रणनीतिक फायदा कितना बड़ा हो सकता है.

भारत के लिए यह सबक बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मौजूदा संघर्ष के इलाक़े से भले ही कुछ हज़ार मील दूर हो, लेकिन इसकी सीमाएं ‘दुश्मनों’ से घिरी हैं.

28 फरवरी को झड़पें शुरू होने के बाद से ईरान ड्रोन के झुंडों का इस्तेमाल कर निशाने साध रहा है. खासतौर पर शाहेद-136, शाहेद-107 और शाहेद-238 ड्रोन का उपयोग खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी और इसरायली एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बनाने के लिए किया गया है.

शाहेद 136 और शाहेद 107 पिस्टन इंजन वाले एकतरफ़ा हमला करने वाले लॉयटरिंग म्यूनिशन हैं (ऐसे हथियार जो लक्ष्य क्षेत्र में मंडराते रहते हैं), जबकि शाहेद 238 जेट इंजन से चलने वाला लॉयटरिंग म्यूनिशन है.

ईरानी ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे सस्ते हैं और आसानी से बनाए जा सकते हैं. युद्ध में इस्तेमाल किए गए शाहेद ड्रोन की कीमत 20,000 से 50,000 डॉलर प्रति ड्रोन पड़ती है.

इसके विपरीत इन्हें रोकने के लिए तैनात अमेरिकी और इसरायली एयर डिफेंस सिस्टम बेहद महंगे हैं. अनुमान हैं कि अमेरिका के टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (थाड) सिस्टम या पैट्रियट मिसाइल सिस्टम (पीएसी 3) से किए गए हर एक इंटरसेप्शन (हमलावर मिसाइल या ड्रोन को रास्ते में मार गिराने) पर 10 लाख से 40 लाख डॉलर तक का खर्च आता है.

इस लागत के भारी अंतर के अलावा और भी जटिलताएं हैं, जैसे कि इंटरसेप्टर मिसाइलों का तेज़ी से ख़त्म होना और उन्हें दोबारा बनाने व तैनात करने की लंबी प्रक्रिया. रिपोर्टों के मुताबिक, सप्लाई चेन की कमज़ोरियों के कारण युद्ध में दागी गई टॉमहॉक मिसाइलों की भरपाई में पांच साल से ज़्यादा का समय लग सकता है.

अमेरिका ने ईरान के ‘सबसे बड़े पुल’ पर किया हमला, क्या बोले ईरानी विदेश मंत्री?

संघर्ष के शुरुआती दिनों में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने में 800 से ज्यादा इंटरसेप्टर मिसाइलें ख़र्च कर दीं. इसके उलट, लॉकहीड मार्टिन ने पूरे साल -2025 में, सिर्फ़ 620 पीएसी-3 मिसाइलों का ही निर्माण किया था.

असल में, ईरान के ड्रोन झुंड भेजने की लागत और उन्हें निष्क्रिय करने या रोकने के लिए अमेरिका, इसराइल और उनके सहयोगियों के इस्तेमाल किए जा रहे इंटरसेप्टर सिस्टम की लागत के बीच एक बड़ा अंतर है.

लागत के इसी असंतुलन, जिसे सप्लाई चेन की संरचनात्मक सीमाओं और रिप्लेसमेंट की मुश्किलों ने और गहरा कर दिया है, ने इस संघर्ष में एक प्रतिकूल आर्थिक स्थिति पैदा कर दी है. इससे ईरान को संयुक्त विरोध के मुकाबले अपनी तुलनात्मक सैन्य कमज़ोरी की भरपाई करने का अवसर मिला है.

युद्ध के बदले हुए आर्थिक समीकरणों ने ईरान को ऐसी रणनीतियां अपनाने में मदद दी है, जो उसके लिए फ़ायदेमंद साबित हुई हैं.

ईरानी ड्रोन इंटरसेप्टर के मुकाबले कहीं कम कीमत के हैं और उन्हें बनाने के साथ ही फिर से तैनात करना आसान है. इसलिए इसराइल, अमेरिका और खाड़ी देशों के लिए इंटरसेप्टर दागने के फ़ैसले और उससे जुड़े आर्थिक बोझ, दोनों के असर और बढ़ गए हैं.

लागत की यह प्रतिकूल आर्थिक स्थिति इतनी प्रभावी है कि कुछ खाड़ी देशों को अपने इंटरसेप्टर भंडार को बचाए रखने के लिए वैकल्पिक रणनीतियां अपनानी पड़ी हैं.

खाड़ी देशों ने शाहेद ड्रोन गिराने के लिए एफ़ 16 लड़ाकू विमानों को सक्रिय किया है. हालांकि यह तरीका भी काफ़ी महंगा है- एक एफ़ 16 को हवा में उड़ाए रखने की लागत लगभग 25,000 डॉलर प्रति घंटे आती है. इससे युद्ध की बदली हुई आर्थिक तस्वीर और जटिल हो गई है.

मौजूदा स्थिति में लागत-विनिमय का अनुपात ईरान के पक्ष में झुका हुआ है और पश्चिमी औद्योगिक क्षमता पर नए हथियार और इंटरसेप्टर उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ गया है.

युद्ध का यह बदला हुआ आर्थिक समीकरण इस बात को रेखांकित करता है कि तकनीकी रूप से उन्नत और पूंजी सम्पन्न सेनाओं को भी कम लागत वाली हथियार प्रणालियों से लैस चालाक और कुशल विरोधी चुनौती दे सकता है.

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस, सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने युद्ध की तकनीकी संरचना को और उलट पलट दिया है.

हालांकि तकनीकी रूप से उन्नत विकल्प सेनाओं की क्षमता को निस्संदेह कई गुना बढ़ा देते हैं, लेकिन अब इन सेनाओं को भविष्य के संघर्षों के लिए कम लागत वाले आक्रामक और रक्षात्मक विकल्पों की भी ज़रूरत होगी.

इसका यह अर्थ नहीं है कि कम पूंजी और निम्न स्तरीय तकनीक वाली सेनाएं ही विजेता बनेंगी, लेकिन इससे युद्ध का मैदान ज़रूर कहीं ज़्यादा जटिल हो जाता है. इस असमानता के प्रभाव केवल पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आगे भी दूरगामी असर डालेंगे.

जम्मू और कश्मीर में 25 जनवरी को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में इस्तेमाल हथियार दिखाए. ड्रोन्स अब दक्षिण एशिया के संघर्षों में भी एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं

भारत पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई से भले ही दूर है, लेकिन उसके आर्थिक और ऊर्जा झटकों से पूरी तरह बचा नहीं है. इस युद्ध के भारत के लिए कई अहम मायने हैं.

जैसा कि पिछले साल गर्मियों में भारत पाकिस्तान के बीच हुए हवाई टकराव में साफ़ दिखाई दिया था, ड्रोनों के झुंड अब दक्षिण एशिया के संघर्षों में भी एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं.

यहां तक कि म्यांमार में भी जुंटा और विद्रोहियों के बीच ड्रोन युद्ध देखने को मिल रहा है. पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष से सामने आ रही तेज़ तकनीकी प्रगति और असममित ड्रोन रणनीतियां उपमहाद्वीप में ड्रोन युद्ध को और भी जटिल बना देंगी.

भारतीय सेना के ड्रोन हथियार भंडार में कई हाई टेक ड्रोन हैं. इनमें इसराइल के टोही ड्रोन आईएआई सर्चर और हार्पर शामिल हैं. इसके अलावा इसराइल से ही आए लॉयटरिंग म्यूनिशन, जैसे हारोप और हार्पी भी हैं, जिनका इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था.

ट्रंप ने कहा, आने वाले हफ़्तों में ईरान पर करेंगे बड़ा हमला

हार्पी का एक वेरिएंट- स्काई स्ट्राइकर, भारत में सह उत्पादन के तहत बनाया जा रहा है. अमेरिकी निर्मित एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी समय के साथ भारतीय भंडार में शामिल किए जाएंगे. स्वदेशी कामिकाज़े ड्रोन, जैसे कि नागस्त्र 1, को भी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तैनात किया गया था.

हालांकि भारतीय सैन्य भंडार में एक बड़ी और स्पष्ट कमी यह है कि सस्ते और आसानी से बनाए जा सकने वाले कामिकाज़े ड्रोन बहुत सीमित संख्या में उपलब्ध हैं.

भारत को कामिकाज़े ड्रोन्स ख़रीदने के निर्माण और ख़रीद- दोनों की योजनाओं को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की ज़रूरत है. भले ही नागस्त्र जैसे स्वदेशी समाधान और हाल की परियोजनाएं काल (KAL) और शेषनाग जैसे ड्रोन मौजूद हैं, लेकिन छोटी छोटी और टुकड़ों में की गई ख़रीद से ये बड़े पैमाने पर इस्तेमाल लायक नहीं बन पाते.

ज़रूरत इस बात की है कि सेना कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन्स को अगर दसियों हज़ार नहीं तो, हज़ारों की संख्या में ऑर्डर करे. मौजूदा तरीका, जिसमें सीमित संख्या में ऑर्डर दिए जाते हैं और जिनके मिलने में लंबा समय लग जाता है, लंबे समय में फ़ायदेमंद नहीं होगा, ख़ासकर निर्माताओं के लिए वित्तीय दृष्टि से.

ईरानी ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे सस्ते हैं

और आसानी से बनाए जा सकते हैं
जंगों में कम लागत वाले लॉयटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल आगे और बढ़ने ही वाला है, जिसे ईरान की रणनीतियों से और गति मिली है.

यहां तक कि अमेरिका ने भी मौजूदा संघर्ष में ईरान की असममित रणनीतियों का मुकाबला करने के लिए लो कॉस्ट अनमैन्ड कॉम्बैट अटैक सिस्टम (LUCAS) तैनात किया है. अमेरिका के विशाल सैन्य औद्योगिक ढांचे को देखते हुए, भारत के लिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है.

पश्चिम एशिया से मिलने वाला एक और अहम सबक यह है कि सस्ते और लागत प्रभावी काउंटर ड्रोन सिस्टम को बड़े पैमाने पर विकसित करने, बनाने और खरीदने की ज़रूरत है- ठीक वैसे ही, जैसे यूक्रेन रूस युद्ध के दौरान ऐसे सिस्टम विकसित किए गए हैं.

खाड़ी देशों के पास इस तरह की प्रणालियों की कमी है, जिसका नकारात्मक असर मौजूदा युद्ध में देखने को मिला है. ये कम लागत वाले या सस्ते सिस्टम, मौजूदा एयर डिफेंस प्रणालियों के ऊपर एक अतिरिक्त परत के तौर पर काम करेंगे.

इससे महंगे एयर डिफेंस सिस्टम का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सकेगा और दुश्मन के कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन से निपटने में उनका उपयोग सीमित रहेगा.

इन उपायों को लागू करने के लिए भारत में संस्थागत और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी.

यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सेना कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से बड़े पैमाने पर ख़रीद प्रक्रिया को अंजाम दे पाती है. लेकिन असली पेच यही है- क्योंकि पूरा समीकरण ख़रीद प्रक्रिया पर टिका है, और यह प्रक्रिया हर स्तर पर घुमावदार और पेचीदा होती है.

Neeraj Kumar Srivastava

आम जन मानस के हित की news के लिए log in करें www.saamgikhans.com गूगल प्ले स्टोर से saamyikhans app जरूर down load करें 🙏

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button