मिथिला की मिट्टी से बदलाव की लकीरें: संघर्ष से सशक्तिकरण तक ममता देवी की प्रेरक यात्रा

बिहार के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गाँव जितवारपुर से निकली ममता देवी आज भारतीय लोककला, विशेषकर मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग का एक सशक्त नाम बन चुकी हैं। उनकी यात्रा केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सामाजिक बदलाव की मिसाल है। बहुत कम उम्र, मात्र 12 वर्ष में विवाह हो जाने के बावजूद ममता देवी ने अपने सपनों को कभी सीमित नहीं होने दिया। विवाह के बाद जब वे दिल्ली आईं, तो परिस्थितियाँ बेहद कठिन थीं। न रहने की व्यवस्था, न नियमित आमदनी—कई बार भोजन और यात्रा के लिए पैसे नहीं होते थे और कुछ रुपये बचाने के लिए उन्हें रोज़ पाँच किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता था। लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बीच उनकी कला के प्रति आस्था और जुनून अडिग रहा।
ममता देवी ने मिथिला पेंटिंग की पारंपरिक शैली को न केवल जीवित रखा, बल्कि उसे नई पहचान भी दिलाई। प्राकृतिक रंगों, नीम की टहनी से बने ब्रश और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से वे पौराणिक कथाओं, सामाजिक सरोकारों, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य जैसे विषयों को अपनी कला में प्रभावशाली ढंग से उकेरती हैं। उनकी इसी विशिष्ट कला शैली और योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2016 में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।
ममता देवी की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता है। उन्होंने अब तक 150 से अधिक जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को निशुल्क मिथिला पेंटिंग का प्रशिक्षण दिया। ये महिलाएँ आज न केवल कुशल कारीगर हैं, बल्कि अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर भी बन चुकी हैं। कई प्रशिक्षित महिलाएँ आगे चलकर स्वयं कार्यशालाएँ आयोजित कर रही हैं, जिससे यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
कोविड-19 महामारी के दौरान, जब पूरे देश में आजीविका का संकट गहराया हुआ था, ममता देवी ने अपनी कला को रोजगार का माध्यम बनाया। उन्होंने हाथ से पेंट किए गए मधुबनी मास्क की शुरुआत की, जिससे सैकड़ों महिलाओं को घर बैठे काम मिला। यह पहल न केवल रोजगार का साधन बनी, बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता और पारंपरिक कला के आधुनिक उपयोग का भी उदाहरण बनी।
ममता देवी ने ‘आर्टदर्शन’ नाम से एक मंच की स्थापना की, जिससे 200 से अधिक कारीगर परिवार जुड़े हैं। इस मंच के माध्यम से ग्रामीण कलाकारों की कलाकृतियाँ देश और विदेश में ऑनलाइन बेची जा रही हैं, जिससे उन्हें उचित मूल्य और वैश्विक पहचान मिल रही है। उनकी कला का प्रदर्शन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना जैसे प्रमुख शहरों के साथ-साथ मलेशिया और जापान जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हो चुका है।
ममता देवी की यात्रा यह साबित करती है कि जब कला के साथ उद्देश्य जुड़ जाए, तो वह समाज को बदलने की ताकत बन जाती है। आज पद्मश्री के लिए उनका नामांकन न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष और उपलब्धियों की मान्यता है, बल्कि भारतीय हस्तकला, मिथिला पेंटिंग और महिला सशक्तिकरण के लिए भी गर्व का क्षण है।



