मुस्कान-साहिल से पहले इन महिलाओं को भी मिली थी फांसी की सजा, लेकिन अमल क्यों नहीं हुआ?

मुस्कान-साहिल से पहले इन महिलाओं को भी मिली थी फांसी की सजा, लेकिन अमल क्यों नहीं हुआ?
मेरठ के चर्चित ब्लू ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है। हालांकि, भारत में किसी दोषी को मौत की सजा मिलना और उसे फांसी दिया जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मृत्युदंड के बाद भी दोषी के पास अपील और दया याचिका जैसे कानूनी अधिकार रहते हैं।
मौत की सजा के बाद क्या होता है?
निचली अदालत से मिली फांसी की सजा की हाईकोर्ट से पुष्टि जरूरी होती है। हाईकोर्ट सजा को बरकरार रख सकता है, उसे उम्रकैद में बदल सकता है या दोषी को बरी भी कर सकता है।
इसके बाद दोषी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी पुनर्विचार याचिका और उपचारात्मक याचिका का विकल्प उपलब्ध रहता है।
दया याचिका का भी अधिकार
कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोषी राष्ट्रपति या राज्यपाल के सामने दया याचिका दाखिल कर सकता है। दया याचिका लंबित रहने तक आमतौर पर फांसी पर अमल नहीं किया जाता।
मामले में देरी, नए सबूत, मानसिक या शारीरिक स्थिति और अन्य कानूनी पहलुओं पर भी अदालतें विचार कर सकती हैं। इसी वजह से कई दोषियों को मौत की सजा मिलने के बावजूद वर्षों तक फांसी नहीं दी गई।
किन महिलाओं को मिली थी मौत की सजा?
भारत में कई महिलाओं को अलग-अलग गंभीर अपराधों में मृत्युदंड सुनाया गया, लेकिन कुछ मामलों में अपील, दया याचिका, सजा में बदलाव या कानूनी प्रक्रिया के कारण फांसी नहीं हो सकी। ऐसे मामलों में अदालतें यह भी देखती हैं कि अपराध “दुर्लभतम से दुर्लभ” श्रेणी में आता है या नहीं।
इसलिए किसी महिला या पुरुष को मौत की सजा मिलना अंतिम रूप से फांसी दिए जाने की गारंटी नहीं होता। ब्लू ड्रम मामले में भी सजा पर अमल से पहले न्यायिक पुष्टि और सभी कानूनी विकल्पों की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।



