दादा’ अब नहीं रहे: जब सिसक पड़े देवेंद्र फडणवीस, सुनेत्रा पवार की खामोशी ने सबको रुला दिया

अस्पताल के उस कमरे में वक्त जैसे थम गया हो. कुर्सी पर बैठीं सुनेत्रा पवार के चेहरे पर गहरा सदमा था और आंखों में वो अंतहीन सूनापन, जैसे उन्हें अब भी यकीन न हो रहा हो कि अजित दादा अब नहीं रहे. हाथ जोड़े शायद ईश्वर से कोई शिकायत कर रही थीं … कमरे में सुनेत्रा ताई के ठीक सामने बैठे थे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और अजित पवार के बेहद करीबी दोस्त देवेंद्र फडणवीस. सियासत में उन्हें फौलादी इरादों के लिए जाना जाता है, लेकिन आज वे बेबस नजर आ रहे थे. सिर झुकाए बैठे हुए, हाथ बांधे हुए, मानो वे खुद को बिखरने से रोकने की कोशिश कर रहे हों.
अपने आंसू रोक नहीं पाए. जिस अजित दादा के साथ उन्होंने सुबह की शपथ से लेकर महायुति की सरकार तक का सफर तय किया, आज उन्हें इस तरह जाता देख फडणवीस अंदर से टूट गए थे. उनकी नम आंखें और झुका हुआ चेहरा बता रहा था कि आज ‘सागर’ बंगले का रणनीतिकार नहीं, बल्कि अजित का सखा रो रहा है
शिंदे और राज्यपाल की निशब्द उपस्थिति
सुनेत्रा पवार के बगल में बैठे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और राज्यपाल आचार्य देवव्रत की खामोशी कमरे के भारीपन को और बढ़ा रही थी. शिंदे, जो खुद एक जुझारू शिवसैनिक रहे हैं और भावनाओं को काबू में रखना जानते हैं, वे भी शून्य में ताकते नजर आए. सुनेत्रा ताई के जुड़े हुए हाथ देखकर वहां मौजूद हर शख्स की जुबान पर ताला लग गया था. क्या कहें? किस शब्दों में ढाढस बंधाएं? जब नियति इतना बड़ा घाव दे जाए, तो सांत्वना के शब्द भी खोखले लगते हैं.
जुड़े हाथ और अनकहे सवाल
तस्वीर में सुनेत्रा पवार के जुड़े हुए हाथ सबसे ज्यादा विचलित करते हैं. वे हाथ शायद इसलिए जुड़े थे क्योंकि अब इंसान के बस में कुछ नहीं रहा था. वे उस नियति को नमन कर रही थीं जिसने एक ही पल में ‘बारामती के राजा’ को उनसे छीन लिया. उनके चेहरे पर आंसू नहीं थे, लेकिन वो ‘पत्थराई हुई खामोशी’ थी जो चीख-चीखकर उनके दर्द को बयां कर रही थी.



