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मायावती ने निकाली PDA की ‘हवा’, मंच से गिनवाई अखिलेश के ‘कर्मों’ की ‘सजा’? दलितों पर सियासत का ‘डबल स्टैंडर्ड’

9 साल बाद यूपी की राजधानी लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने अपना जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया. यह मौका था BSP के संस्थापक कांशीराम की 19वीं पुण्यतिथि का. कांशीराम स्मारक स्थल पर जब मायावती बोलने के लिए खड़ी हुईं तो सभी का ध्यान इस बात पर का था कि उत्तर प्रदेश में दो ध्रुवीय हो चुकी राजनीति को मायावती फिर से कैसे त्रिकोणिय बनाएंगी. उनका संदेश सीधा था अपने कोर वोट बैंक को पहले से ज्यादा मजबूत करना.

मायावती ने मंच से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे पर तीखा हमला किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अखिलेश दलितों के लिए इतने संवेदनशील हैं, तो उनकी सरकार ने SC समाज के महापुरुषों के नाम पर बनाए गए जिलों के नाम क्यों बदले?

दरअसल, मायावती का आरोप 13 साल पहले अखिलेश सराकर के उस फैसले को लेकर था, जब साल 2012 में अखिलेश यादव की सरकार ने यूपी के 8 जिलों के नाम बदल दिए थे. इन जिलों के नाम मायावती ने दलित पहचान से जोड़ कर रखा था. कांशीराम नगर का नाम बदलकर कासगंज, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर का नाम अमेठी, रमाबाई नगर का कानपुर देहात, भीम नगर का संभल, प्रबुद्ध नगर का शामली, पंचशील नगर का हापुड़ और ज्योतिबा फुले नगर का अमरोहा कर दिया गया.

मायावती ने जिलों के नाम बदलने पर अखिलेश यादव को कटघरे में खड़ा ही नहीं किया. बल्कि, मायावती ने योगी आदित्यनाथ सरकार की कांशीराम स्मारक के रखरखाव की तारीफ की और कहा कि अखिलेश ने इसको नजरअंदाज किया. इस पर अखिलेश यादव ने मीडिया के सामने सफाई दी और कहा कि उनकी सरकार ने स्मारक स्थल पर पेड़ लगाए थे और रखरखाव के निर्देश भी दिए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि मायावती की बातें ‘अंदरूनी सांठगांठ’ का हिस्सा हैं. साथ ही, अखिलेश ने कहा, ‘कांशीराम स्मारक स्‍थल पर कई तरह के पेड़ उनकी सरकार ने लगवाए थे और प्रतिमा के रखरखाव के लिए निर्देश भी दिए थे.’

अखिलेश का यह जवाब उस नैरेटिव से बचाव था, जिससे यह साबित हो सकता था कि उनकी सरकार दलितों के खिलाफ थी. क्योंकि, वोट बैंक के लिहाज से मायावती अभी कमजोर जरूर हैं, लेकिन वे अभी भी दलित समाज की सबसे बड़ी नेता हैं. वहीं, CSDS सर्वे के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में जाटव समाज का 44% वोट BSP को मिला, जबकि NDA को 24% और INDIA ब्लॉक को 25% वोट मिले. लेकिन गैर-जाटव SC वोटरों का 56% वोट INDIA को मिला, NDA को 29% और मायावती को केवल 15% वोट था.

मायावती का आक्रमक रुख इस समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है, जिससे सबसे ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव को होगा. यही वजह है कि अखिलेश को 1991 के चुनाव और मुलायम-कांशीराम के गठजोड़ की याद आ रही है. मायावती 2012-2017 के अखिलेश सरकार के उन फैसलों को गिनवाने में लगी हैं, जिनमें दलितों के लिए विशेष कोटे और योजनाएं खत्म की गई थीं.

अखिलेश सरकार ने बंद की यह योजनाएं और सुविधाएं

– SC/ST ठेकेदारों के लिए 25 लाख रुपए तक के आरक्षण नियम को खत्म किया.

– SC ठेकेदारों के लिए 21% कोटा खत्म किया.

– ST ठेकेदारों के लिए 2% कोटा समाप्त किया.

– कांशीराम, सावित्रीबाई फुले, बाबा साहेब आंबेडकर के नाम पर चलाई जा रही 5 योजनाएं बंद कीं.

BSP समर्थक 1995 के गेस्ट हाउस कांड और दलितों की बदतर स्थिति को भी याद दिला रहे हैं. 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां इसी राजनीतिक बिसात पर चल रही हैं.

अखिलेश के लिए मुश्किलों का सबब बन गए ये फैसले

ये फैसले अब अखिलेश के लिए मुश्किलों का सबब बन गए हैं. बीएसपी समर्थक अब 1995 के गेस्ट हाउस कांड भी याद दिला रहे हैं और अखिलेश सरकार के दौरान दलितों के हालात भी याद दिला रहे. इन सबके इर्दगिर्द 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ रही है, लेकिन आज गूंज में सवाल इससे आगे का है.

सवाल जो गूंज रहे

– अखिलेश यादव PDA परिवार का नारा देते हैं, लेकिन उनकी सरकार ने दलित पहचान को मिटाने की कोशिश क्यों की?

– क्या विपक्ष में रहकर दलित संवेदना सिर्फ वोट बैंक तक सीमित रह गई है?

– क्या मायावती के सक्रिय होने से यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव आएगा?

दलितों पर अखिलेश के ‘डबल स्टैंडर्ड’!

अखिलेश यादव ने 8 जिलो के नाम बदले, विश्वविद्यालय के नाम बदले, योजनाओं के नाम बदले. यहां तक की उन्होंने पुरस्कारों के नाम भी बदले. अखिलेश ने SC/ST से संबंधित सुविधाओं को बंद किया. इतना ही नहीं, सरकारी ठेकों में कोटा था, जिसे भी खत्म कर दिया गया. SC/ST ठेकेदारों को 25 लाख रुपए तक का आरक्षण था. SC ठेकेदारों के लिए 21% कोटा निर्धारित था. ST ठेकेदारों के लिए 2% कोटा निर्धारित था.

saamyikhans

former crime reporter DAINIK JAGRAN 2001 and Special Correspondent SWATANTRA BHARAT Gorakhpur. Chief Editor SAAMYIK HANS Hindi News Paper/News Portal

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