बंगाल की राजनीति में ‘मंदिर’: आस्था या चुनावी बिसात?

पश्चिम बंगाल की राजनीति, जो कभी ‘वामपंथी विचारधारा’ और ‘वर्ग संघर्ष’ के इर्द-गिर्द घूमती थी, अब पूरी तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक पहचान की ओर मुड़ गई है। भाजपा ने जहाँ ‘जय श्री राम’ के नारे और राम मंदिर के मुद्दे को अपनी मुख्य ताकत बनाया है, वहीं ममता बनर्जी ने इसका जवाब ‘चंडी पाठ’ और ‘स्थानीय देवी-देवताओं’ के पुनरुद्धार से दिया है।
चुनाव पर इसके संभावित प्रभाव:
हिंदू मतों का विभाजन: भाजपा की रणनीति हिंदू वोटों को एक बड़े ब्लॉक के रूप में एकजुट करने की है। इसके विपरीत, ममता बनर्जी खुद को ‘हिंदू बेटी’ के रूप में पेश कर मंदिरों (जैसे तारापीठ, गंगासागर, कालीघाट) का जीर्णोद्धार कर रही हैं। उनका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हिंदू वोट पूरी तरह भाजपा की ओर न झुकें।
बंगाली अस्मिता बनाम हिंदुत्व: टीएमसी ने बहुत चालाकी से भाजपा के ‘हिंदुत्व’ को ‘बाहरी’ (हिंदी पट्टी का) बताया है और खुद को ‘बंगाली हिंदू धर्म’ (दुर्गा पूजा और काली पूजा) का रक्षक घोषित किया है। यह सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई चुनाव में स्थानीय मतदाताओं को काफी प्रभावित करेगी।
अल्पसंख्यक समीकरण: मंदिर राजनीति के इस दौर में ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधे रखना है। अगर वे बहुत ज्यादा ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर झुकती हैं, तो यह उनके मूल समर्थकों के बीच भ्रम पैदा कर सकता है।
विकास के मुद्दों पर भारी: इस धार्मिक प्रतिस्पर्धा के कारण अक्सर बेरोजगारी, शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी मुद्दे गौण हो जाते हैं। चुनाव विकास के बजाय भावनाओं और पहचान पर केंद्रित होने की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में ‘मंदिर राजनीति’ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब जीत उसी की होगी जो धर्म और क्षेत्रीय पहचान के सही मिश्रण को जनता के सामने रख पाएगा। जहाँ भाजपा के लिए यह सत्ता के करीब पहुँचने का जरिया है, वहीं ममता बनर्जी के लिए यह अपनी सत्ता बचाने की एक रक्षात्मक दीवार है।



