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डिग्री है, नौकरी नहीं — युवा कहाँ फँस गया?

हाथ में डिग्री, आँखों में सपने और जेब में बेरोज़गारी—आज देश का बड़ा युवा वर्ग इसी त्रिकोण में फँसा हुआ है। कॉलेज से निकलते ही उम्मीद होती है कि मेहनत रंग लाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि डिग्री मिलते ही इंतज़ार शुरू हो जाता है—भर्ती का, रिज़ल्ट का, कॉल का।

युवाओं का कहना है कि पढ़ाई के दौरान उन्हें बताया गया था कि शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है। मगर डिग्री पूरी होने के बाद पता चलता है कि बाज़ार में मांग स्किल की है, और सिस्टम में भरोसा सिफ़ारिश का। सरकारी भर्तियाँ समय पर नहीं निकलतीं, और निकलती भी हैं तो सालों तक प्रक्रिया अटकी रहती है।

प्राइवेट सेक्टर में हालात अलग नहीं। “फ्रेशर चाहिए, लेकिन अनुभव भी”—यह शर्त कई युवाओं को शुरुआत में ही बाहर कर देती है। कम सैलरी, अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट और जॉब सिक्योरिटी की कमी युवा मन में अस्थिरता पैदा कर रही है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार रिजेक्शन और अनिश्चितता से युवाओं में तनाव, आत्म-संदेह और अवसाद बढ़ रहा है। कई प्रतिभाशाली छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्र में सालों फँसे रहते हैं, जबकि उनके हुनर धीरे-धीरे जंग खाने लगते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान सिर्फ़ भर्तियाँ बढ़ाने से नहीं आएगा। करिकुलम को इंडस्ट्री से जोड़ना, स्किल-आधारित ट्रेनिंग, अप्रेंटिसशिप और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया—ये कदम युवाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दे सकते हैं।

सवाल अब भी कायम है—

जब डिग्री है, मेहनत है और हुनर भी,

तो नौकरी क्यों नहीं?

और इस सवाल का जवाब ढूँढना सिर्फ़ युवाओं की नहीं, पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है।

saamyikhans

former crime reporter DAINIK JAGRAN 2001 and Special Correspondent SWATANTRA BHARAT Gorakhpur. Chief Editor SAAMYIK HANS Hindi News Paper/news portal/

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