चुप्पी की चोट, ट्रंप की खिसियाहट और मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मुलाकात, क्या QUAD बदलने वाला है?*

चुप्पी पर माथापच्ची चल रही है. जब चुप्पी एकतरफा हो तो दूसरी तरफ क्या हाल होता है, हम सब देख ही रहे हैं. खीझ, हताशा, धमकी. इस आस में कि चुप रहने वाला एक सीमा के बाद तो मुंह खोलेगा. चुप्पी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इतना बड़ा हथियार हो सकता है, शायद किसी ने सोचा नहीं होगा. रही सीमा की बात तो 25 परसेंट बेस टैरिफ वाली भी देख ली और अब 25 परसेंट एक्सट्रा की सीमा भी पार हो गई. डेडलाइन से एक दिन पहले तक डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर कराने की रट भी जारी रखी और कुछ मिर्च मसाला भी जोड़ते रहे – हमने तो साफ बोल दिया कि इतना टैरिफ लगाएंगे कि दिमाग चकरा जाएगा. सोचा होगा अब शायद अगला झुक जाएगा. रूसी तेल न लेने की कसमें खाएगा. उन्हें क्या पता आपदा में अवसर खोजने वाले से पाला पड़ा है.
आपदा आई अवसर बना
हमने कोई जवाबी कार्रवाई भी नहीं की. अमेरिका अपना माल पहले की तरह भेजता रहे. हमारे जिन सामानों पर दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ अमेरिका ने लगाया है, उसे भी हम ही देख लेंगे. खामोश प्रहार से अमेरिका पस्त है. अमेरिकी मीडिया 25 प्रतिशत एक्स्ट्रा की सीमा पार होने के बाद ट्रंप को ही कोसने लगी है. अमेरिका में महंगाई बढ़ने और गरीबों की हालत खराब होने की बात की जा रही है. एक्सपर्ट इतिहास देख कर और डरे हुए हैं. अमेरिका की हर चाल फेल हुई है. जब गेहूं रोका तो हरित क्रांति आ गई. जब पहला परमाणु बम फोड़ा और प्रतिबंध लगे तो थोरियम को ही फ्यूल बना लिया. जब क्रायोजेनिक रोका तो इसरो ने पीएसएलवी बना लिया. अब हम जीएसटी रिफॉर्म से ही टैरिफ वार की हवा निकाल देंगे. वैसे भी तमाम रिपोर्ट्स के मुताबिक टैरिफ से हमारी जीडीपी को महज 0.1 परसेंट का नुकसान होगा. लेकिन स्वदेशी और गैर अमेरिकी बाजार हमारे लिए तैयार हैं. इसलिए चुप्पी की मार और हमारी चाल अब अमेरिका को झेलनी होगी. वैसे भी ट्रंप की सरकार बिना भारत का नाम लिए एक दिन भी नहीं चल रही. हमारा ग्लोबल फुटप्रिंट बढ़ाने में चुटकी भर योगदान ट्रंप भी दे रहे हैं.
सकते में वाइट हाउस
मोदी की चर्चा और हर एक कदम पर अमेरिकी नजर और तेज रहने वाली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टोक्यो और बीजिंग में एक के बाद एक टॉप लेवल मीटिंग करने वाले हैं. खास कर अगले चार दिन काफी रोचक हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मोदी की होने वाली मुलाकात पर वाइट हाउस सकते में है. उधर व्लादिमीर पुतिन अलास्का की एक-एक बात मोदी को बता चुके हैं. फिर बीजिंग में मिलना भी होगा. इससे पहले 29 अगस्त को मोदी जापान जा रहे हैं. शिंजो आबे के साथ 2014 से दोस्ती की जो कहानी लिखी उसे शिगेरु इशिबा के साथ आगे बढ़ाएंगे. आज की तारीख में भारत और जापान इंडो एशिया क्षेत्र में स्थिरता के दो स्तंभ है. रिश्ते किसी स्वार्थ के मोहताज नहीं. न ही आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़. भगवान बुद्ध की सांस्कृतिक विरासत पर फला फूला रिश्ता बुलेट ट्रेन की गति से आगे बढ़ रहा है जिसका इतिहास 74 साल पुराना है.
दरअसल जापान के साथ रिश्तों की बुनियाद से ही चीन के साथ हमारे रिश्ते तय हुए. भारत एशिया का पहला देश था जिसने जापान से कूटनीतिक संबंध 1951 में बनाए. यही नहीं हमने जापान से जंग में हुए नुकसान के लिए मुआवजा भी नहीं मांगा क्योंकि विश्व युद्ध में ब्रिटेन के साथ भारत भी शामिल हुआ था. पंडित नेहरू का मानना था कि वैसे भी भारत को जरा सा नुकसान हुआ है और जापान से रिश्ते किसी मुआवजे से ज्यादा महत्वपूर्ण है दूसरे विश्व युद्ध के बाद सैन फ्रांसिस्को पीस ट्रिटी का विरोध किया और जापान का समर्थन. इसमें जापान की सरजमीं पर अमेरिकी मिलिट्री बेस का जिक्र था. भारत ने समझौते का विरोध इसलिए भी किया कि इसमें चीन को शामिल नहीं किया गया. एशियाई एकता पर जोर देने वाले नेहरू इसे जरूरी मानते थे.
पर, जवाहर लाल नेहरू से चूक हुई. चीन ने हमारे साथ विश्वासघात किया. हम जंग हारे. कड़वाहट दशकों तक जारी रही. राजीव गांधी और अटल जी के समय रिश्ते पटरी पर आए. लेकिन डोकलाम और गलवान ने फिर जंग की नौबत पैदा कर दी. कजान में मोदी – जिनपिंग मुलाकात के बाद दोबारा संपर्क बढ़ा. पर ये किसी को अंदाजा नहीं था कि सीमा पर जंग के लिए तैयार दोनों मुल्क इतनी जल्दी इतने करीब आएंगे. लेकिन ट्रंप की करनी ने ये तय कर दिया. वैश्विक कूटनीति और दशकों की मेहनत से बने रिश्तों को आर्थिक स्वार्थ के आधार पर तौलने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने पहले चीन से पंगा लिया. टैरिफ 100 परसेंट पार कर दिया और जवाब में टैरिफ लगा तो कदम खींच लिए. फिर रूस-यूक्रेन जंग रोकने के लिए हमें बलि का बकरा बनाने की कोशिश की. तोहमत लगाई कि पुतिन जंग के लिए पैसा भारत को सस्ते में तेल बेचकर जुटा रहे हैं. ऐसा तो जेलेंस्की ने भी नहीं कहा. लेकिन ट्रंप कि तिलमिलाहट ऑपरेश सिंदूर के दौरान किराना हिल्स पर ब्रह्मोस अटैक की खबरों के बाद से बढ़ी हुई है.
ये तिलमिलाहट बढ़ने वाली है. क्वाड के दो सदस्य जापान और ऑस्ट्रेलिया उनसे खुश नहीं है. जापान के साथ ट्रेड समझौते का ऐलान कर ट्रंप ने जलील भी कर दिया. इससे जापान नाराज है. व्यापार पर बात करने वाली टीम ने वाशिंगटन दौरा टाल दिया है. उधर ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री पेनी वोंग ने साफ किया है कि वो टैरिफ के पक्ष में नहीं है क्योंकि ये WTO के नियमों को ताक पर रखता है. मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मुलाकात सिर्फ तीन नेताओं के बीच नहीं होगी बल्कि इसमें दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के भविष्य पर चर्चा होगी. मौजूदा हालात में क्वाड बेमानी लग रहा है और नया क्वाड सामने दिखाई दे रहा है. चीन से निपटने के लिए भारत – जापान – अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर इसका गठन किया. लेकिन ट्रंप के चाल चलन से इसकी प्रासंगिकता ही कटघरे में है. तो क्या इसका स्वरूप बदल सकता है. अगर भारत, चीन, जापान और रूस मिल जाएं तब भी क्वाड बना रहेगा. निश्चित तौर पर ये कहना जल्दबाजी होगी लेकिन दुनिया जितनी तेजी से घूम रही है, कुछ भी असंभव कहना उचित नहीं है.
तीनों देश मिल कर कितनी ताकत रखते हैं, इसे कुछ पॉइंट्स में समझते हैं-
भारत-रूस-चीन की सामूहिक जीडीपी परचेजिंग पावर पैरिटी के हिसाब से 54 ट्रिलियन डॉलर है जो पूरी दुनिया के इकॉनमिक आउटपुट का एक तिहाई है.
तीनों देशों की आबादी 3.1 अरब है. पूरी दुनिया की आबादी लगभग 8 अरब है.
तीनों देशों के पास पूरी दुनिया की 38 प्रतिशत विदेशी मुद्रा है
सामूहिक मिलिट्री बजट लगभग 550 अरब डॉलर है जो पूरी दुनिया के डिफेंस बजट का 20 प्रतिशत है.
चीन मैन्युफैक्चरिंग सुपर पॉवर है, रूस एनर्जी सोर्स का बड़ा सप्लायर है और भारत सर्विस सेक्टर का सुपरपॉवर है.