उन्नाव रेप केस: सत्ता, सिस्टम और एक लड़की की जंग

उन्नाव, उत्तर प्रदेश।
साल 2017 , एक छोटा-सा कस्बा और एक नाबालिग लड़की, जो इंसाफ़ की उम्मीद लेकर थाने पहुंचती है। आरोप था—उत्तर प्रदेश के ताकतवर विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर। लेकिन थाने के दरवाज़े उसके लिए नहीं खुले। FIR दर्ज नहीं हुई, उल्टा दबाव बनाया गया।
यह कोई आम मामला नहीं था, क्योंकि आरोपी कोई आम आदमी नहीं था।
अप्रैल 2018 में पीड़िता लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर पहुंची। हाथ में गुहार थी, दिल में टूटन।
और फिर—उसने खुद को आग लगा ली।
देश सन्न रह गया। कैमरे जागे, चैनल बोले, सोशल मीडिया उबल पड़ा। तब जाकर सिस्टम हरकत में आया।
मामला यहीं नहीं रुका।
पीड़िता के पिता की जेल में संदिग्ध हालात में मौत,चाचा को झूठे केस में जेल।
2019 में एक भयानक सड़क हादसा
पीड़िता की चाची की मौत
वकील की मौत
CBI जांच में खुलासा हुआ—
यह हादसा नहीं, साजिश थी। 2019 में दिल्ली की अदालत ने
कुलदीप सिंह सेंगर को उम्रकैद की सज़ा सुनाई।
कोर्ट ने साफ कहा—यह सिर्फ रेप नहीं, बल्कि
सत्ता के ज़रिये इंसाफ़ कुचलने की कोशिश थी।
देश ने राहत की सांस ली। लगा—शायद देर से ही सही, न्याय हुआ।
2024–25 में सेंगर को सशर्त राहत , जमानत जैसी सुविधाएं मिलने की खबरें आईं।
बस फिर क्या था—दिल्ली से लेकर कई राज्यों तक प्रदर्शन शुरू हो गए।
नारे लगे—
“रेप के दोषी को रिहाई नहीं”
“पीड़िता को दोबारा मत मारो”। अगर उस लड़की ने खुद को आग न लगाई होती,तो शायद कुलदीप सेंगर आज भी
सत्ता की कुर्सी पर बैठा होता।
यह केस सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं है,
यह सवाल है—
क्या कानून ताकतवरों के लिए अलग होता है?
जब तक जवाब “नहीं” में नहीं बदलता,
तब तक ऐसे प्रदर्शन ज़रूरी हैं।
क्योंकि खामोशी—
अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत होती है।



