महागठबंधन में महासंग्राम… बिहार में दिल्ली दोहराएगी कांग्रेस? सीटों पर RJD से अनबन, तेजस्वी की बढ़ी टेंशन!

बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर महागठबंधन का रंग-ढंग किसी की समझ में नहीं आ रहा. संभव है, बिहार में महागठबंधन को लीड करने वाले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और उनके पिता लालू यादव इसे समझ रहे हों. तभी तो दिल्ली से पटना लौटकर तेजस्वी ने कह दिया कि महागठबंधन पूरी ताकत के साथ एकजुट है. हालांकि ऐसा धरातल पर दिख नहीं रहा. एनडीए ने सीटों का बंटवारा कर लिया. जेडीयू ने सिंबल बांटने शुरू कर दिए. जीतन राम मांझी ने भी हम को हिस्से में मिली सीटों पर अपने उम्मीदवारों का चयन कर लिया. भाजपा ने अभी तक उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं की है, लेकिन इशारों में उम्मीदवारों को बता दिया गया है कि किसे कहां लड़ना है. पर महागठबंधन में अभी तक सीट शेयरिंग पर बैठकों का दौर ही चल रहा है.
तेजस्वी को राहुल ने नहीं दिया समय
आईआरसीटीसी घोटाला मामले में पेश होने के लिए लालू, राबड़ी और तेजस्वी यादव सोमवार को दिल्ली में थे. माना जा रहा था कि तेजस्वी की मुलाकात राहुल गांधी से होगी. सीट बंटवारे पर गतिरोध खत्म होगा और महागठबंधन सीटों का ऐलान कर देगा. तेजस्वी गए भी मिलने, लेकिन राहुल से नहीं मिल पाए. उनकी मुलाकात कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से हुई. वहां बिहार प्रदेश कांग्रेस के सीनियर लीडर भी मौजूद थे. बातचीत का नतीजा क्या निकला, यह तो किसी को पता नहीं चला. तेजस्वी देर रात पटना लौट आए. लालू और राबड़ी पहले ही पटना लौट चुके थे. तेजस्वी ने सिर्फ इतना ही कहा कि महागठबंधन में सब ठीक है. जल्द टिकट बंटवारे का ऐलान हो जाएगा. महागठबंधन पहले की तरह एकजुट है.
साथी दलों का धैर्य टूटा, बांट रहे सिंबल
न बैठक हुई और न सीटों की घोषणा हुई, लेकिन महागठबंधन के साथी दल सिंबल बांटने लगे हैं. इसकी शुरुआत सीपीआई (एमएल) ने पहले ही कर दी थी. अभी 6 चुनाव क्षेत्रों में अपने उम्मीदवारों को सीपीआई (एमएल) सिंबल बांट चुकी है. इतना ही नहीं, आरजेडी ने भी इसकी शुरुआत कर दी है. लालू यादव से सिंबल लेते कुछ उम्मीदवारों की तस्वीरें भी सामने आई हैं. अलबत्ता कांग्रेस ने अभी तक सीटों या उम्मीदवारों की घोषणा से परहेज किया है. वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी भी राहुल से मुलाकात के लिए दिल्ली गए थे. स्वाभाविक है कि जब महागठबंधन के नेता तेजस्वी से राहुल नहीं मिले तो सहनी से मुलाकात का सवाल ही नहीं उठता. वे भी बैरंग लौट आए. सीपीआई (एमएल) ने तर्क दिया है कि उसे जितनी सीटों पर लड़ना है, वहां उम्मीदवार देगी ही. अगर बंटवारे में वे सीटें दूसरे किसी दल को मिलीं, तब भी उम्मीदवार नहीं हटाएगी. यानी फ्रेंडली फाइट की सीपीआई (एमएल) ने तैयारी कर ली है.
मुकेश सहनी बन गए डगरा के बैंगन
महाठबंधन में तेजस्वी का कथित बड़ा भाई बने वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी फिलहाल डगरा का बैगन बन गए हैं. वे 60 सीटों की मांग करते-करते अब 30 पर आ गए हैं. उन्होंने लोकसभा चुनाव के वक्त से ही अपने को महागठबंधन सरकार का भावी डिप्टी सीएम घोषित कर रखा है. इधर कांग्रेस महागठबंधन में उन्हें किसी विपदा की तरह मान रही है. यह अलग बात है कि बिहार में राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में मुकेश सहनी ने उत्साहित होकर हिस्सा लिया था. यात्रा की एक तस्वीर से तो ऐसा लगा कि कांग्रेस ने भी उन्हें डिप्टी सीएम मान लिया है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के साथ वे राहुल की गाड़ी पर बराबरी में खड़े थे. तेजस्वी यादव गाड़ी ड्राइव कर रहे थे. लोगों ने इसे भावी महागठबंधन सरकार का स्वरूप मान लिया. यानी सरकार की ड्राइविंग सीट पर तेजस्वी तो साथ में 2 डिप्टी सीएम- राजेश राम और मुकेश सहनी. पर, अब इसकी हवा निकल गई है. कांग्रेस उनके डिप्टी सीएम वाली रट से बेहद खफा है. चुनाव परिणाम आने से पहले कांग्रेस जब तेजस्वी को सीएम फेस मानने को तैयार नहीं तो डिप्टी सीएम का सवाल ही नहीं पैदा होता. सहनी के एनडीए में लौटने की अटकलें
कांग्रेस मुकेश सहनी को भरोसेमंद नहीं मान रही. एक मौके पर तो उनकी विश्वसनीयता परखी भी जा चुकी है. 2020 में कम सीटें मिलने पर वे एनडीए की ओर सरक गए थे. इस बार भी उनकी विश्वसनीयता संददिग्ध लग रही है. उनकी एनडीए नेताओं से मुलाकात की खबरें भी आती रही हैं. हालांकि उन्होंने कभी इसे कन्फर्म नहीं किया. महत्वपूर्ण बैठकों से सहनी का गायब रहना, रूठ कर फोन बंद कर लेना या मुंबई चले जाना, ये उनके कुछ ऐसे आचरण रहे हैं, जिससे संदेह तो पैदा होता ही है.
फिर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि वे एनडीए के संपर्क में हैं. एनडीए में उम्मीदवारों के ऐलान के लिए होने वाली प्रेस कान्फ्रेंस रद किए जाने को इसी नजरिए से देखा जा रहा है. भाजपा के चुनावी रणनीतिकार अमित शाह 16-18 अक्टूबर तक बिहार में रहेंगे. अगर सहनी के बारे में सूचनाएं सही हैं तो इसी दौरान उनको एनडीएम में लाने की घोषणा हो सकती है.
दिल्ली दोहराने की तैयारी तो नहीं है
कांग्रेस ने हरियाणा और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी (AAP) से गठबंधन नहीं किया, जबकि दोनों इंडिया ब्लॉक की पार्टनर हैं. इसका खामियाजा दोनों पार्टियों को भोगना पड़ा. हरियाणा में हार का कारण स्पष्ट रूप से वोटों का बिखराव ही रहा. दिल्ली में भी वोटों के बिखराव से आम आदमी पार्टी की दुर्गति हो गई. कांग्रेस साथ रहती तो आप को 12-14 और सीटें मिल सकती थीं. बिहार में भी सीट बंटवारे पर जैसी जिच देखने को मिल रही है, उससे कांग्रेस के दिल्ली दोहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.



