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सूर्य की जासूसी कर रहा सैटेलाइट अचानक ‘डेड’, करोड़ों का मिशन खतरे में

सूर्य की जासूसी कर रहा सैटेलाइट अचानक ‘डेड’, करोड़ों का मिशन खतरे में

नई दिल्ली: अंतरिक्ष में सूर्य का अध्ययन करने के लिए भेजा गया Proba‑3 मिशन अब खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है। European Space Agency (ESA) के इस मिशन में शामिल दो सैटेलाइट्स में से एक से अचानक संपर्क टूट गया है। बताया जा रहा है कि स्पेसक्राफ्ट अपनी दिशा खो बैठा, जिसके कारण उसके सोलर पैनल सूरज की ओर नहीं रहे और बैटरी तेजी से खत्म होने लगी। नतीजतन सैटेलाइट ‘सर्वाइवल मोड’ में चला गया।

दिसंबर 2024 में भारत के PSLV रॉकेट की मदद से लॉन्च किए गए इस मिशन पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वैज्ञानिकों को अब तक इस तकनीकी खराबी की असली वजह का पता नहीं चल पाया है। बताया गया है कि 14 फरवरी के सप्ताहांत में आई एक तकनीकी गड़बड़ी के बाद से मिशन कंट्रोल का एक सैटेलाइट से संपर्क पूरी तरह टूट गया है।

कैसे काम करते हैं ‘सूरज के जासूस’?

प्रोबा-3 मिशन में दो अलग-अलग स्पेसक्राफ्ट शामिल हैं, जो अंतरिक्ष में मिलकर काम करते हैं। इनमें से एक को कोरोनोग्राफ (Coronagraph) और दूसरे को ऑकुल्टर (Occulter) कहा जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में कृत्रिम सूर्य ग्रहण बनाकर सूर्य के बाहरी हिस्से का अध्ययन करना है।

दोनों यानों को अंतरिक्ष में बेहद सटीक दूरी और एलाइनमेंट के साथ उड़ना पड़ता है।

दोनों के बीच लगभग 150 मीटर (करीब 500 फीट) की दूरी रखी जाती है।

इस दौरान एलाइनमेंट की सटीकता मिलीमीटर स्तर तक बनाए रखनी होती है।

इस प्रक्रिया में ऑकुल्टर स्पेसक्राफ्ट सूरज की तेज रोशनी को रोक देता है, जबकि कोरोनोग्राफ सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना की तस्वीरें लेता है। यह हिस्सा इतना धुंधला होता है कि सामान्य परिस्थितियों में इसे देखना लगभग असंभव होता है।

अचानक कैसे बिगड़ गई स्थिति?

6 मार्च 2026 को ESA ने बताया कि कोरोनोग्राफ यान में आई खराबी के बाद घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हो गई। इस तकनीकी गड़बड़ी के कारण सैटेलाइट ने अपनी सही दिशा खो दी, जिसे “लॉस ऑफ एटिट्यूड” कहा जाता है।

स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उसके सोलर पैनल सूरज की ओर से हट गए। इसके कारण बैटरी तेजी से डिस्चार्ज होने लगी और सैटेलाइट ने खुद को ‘सर्वाइवल मोड’ में डाल लिया। फिलहाल यह यान अंतरिक्ष में निष्क्रिय अवस्था में तैर रहा है और पृथ्वी से भेजे जा रहे सिग्नल का कोई जवाब नहीं दे रहा।

क्या मिशन को बचाया जा सकता है?

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मिलीमीटर स्तर की सटीकता बनाए रखना है। जून 2025 में इस मिशन ने सूर्य के कोरोना की पहली ऐतिहासिक तस्वीरें भेजकर वैज्ञानिकों को चौंका दिया था

अब मिशन टीम एक जोखिम भरे कदम पर विचार कर रही है। योजना यह है कि सुरक्षित बचे हुए ऑकुल्टर स्पेसक्राफ्ट को खराब हुए कोरोनोग्राफ के करीब ले जाया जाए, ताकि उसकी वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि यान को दोबारा सक्रिय किया जा सकता है या नहीं।

अगर आने वाले दिनों में संपर्क बहाल नहीं हुआ, तो करोड़ों यूरो की लागत वाला यह मिशन पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

सूर्य के कोरोना की स्टडी क्यों जरूरी है?

सूर्य का कोरोना वह क्षेत्र है, जहां से शक्तिशाली सौर तूफान पैदा होते हैं। ये तूफान पृथ्वी पर मौजूद संचार प्रणालियों, जैसे GPS और पावर ग्रिड, को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
प्रोबा-3 मिशन से मिलने वाला डेटा वैज्ञानिकों को भविष्य में सौर तूफानों की अधिक सटीक भविष्यवाणी करने में मदद कर सकता था। फिलहाल यूरोप की स्पेस एजेंसियों की टीमें इस “सन स्पाई” को दोबारा सक्रिय करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।

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