बिहार

बिहार की सच्चाई: नेताओं को सिर्फ चुनावी मौसम में याद आता है cm का गांव

बिहार के कई इलाकों की कहानी लगभग एक जैसी है — सड़कें टूटी हुई, बिजली की कमी, और सरकारी योजनाओं का लाभ केवल कागजों तक सीमित। पर सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब चुनाव का समय आता है, तो वही भुलाए गए गांव अचानक नेताओं की “पहली प्राथमिकता” बन जाते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री का गांव भी इस हकीकत से अछूता नहीं है। वहां तक पहुंचना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं। बरसात के मौसम में कीचड़ भरी गलियों से गुजरना, टूटी सड़कों पर घंटों सफर करना और बुनियादी सुविधाओं के लिए जद्दोजहद — ये सब वहां के लोगों की रोजमर्रा की कहानी है।

नेता चुनावी मौसम में बड़े-बड़े वादों के साथ पहुंचते हैं। कोई सड़क बनाने का आश्वासन देता है, तो कोई रोजगार का वादा करता है। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट आता है। गांव के लोग उम्मीद करते हैं कि शायद अगली बार कुछ बदलेगा, पर हालात जस के तस बने रहते हैं।

वास्तविकता यह है कि बिहार के विकास की कहानी तब तक अधूरी रहेगी, जब तक सत्ता में बैठे लोग गांवों तक सच्चे अर्थों में नहीं पहुंचेंगे। सिर्फ चुनावी नारों और वादों से नहीं, बल्कि ठोस काम और स्थायी योजनाओं से बदलाव आएगा।

गांव चाहे किसी आम नागरिक का हो या पूर्व मुख्यमंत्री का — अगर वहां पहुंचना मुश्किल है, तो यह सिर्फ एक गांव की नहीं, पूरे सिस्टम की नाकामी का सबूत है।

saamyikhans

former crime reporter DAINIK JAGRAN 2001 and Special Correspondent SWATANTRA BHARAT Gorakhpur. Chief Editor SAAMYIK HANS Hindi News Paper/news portal/

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