न पैसों की मांग, न शर्त, फिर भी 17 बच्चों को बंधक क्यों बनाया? पवई किडनैपिंग कांड का राज

मुंबई के पवई में बच्चों को कैद करने की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. सारे बच्चे सकुशल बचा लिए गए हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है. अगर किसी ने वापस पैसे नहीं मांगे और न ही किसी सियासी या आर्थिक शर्त रखी, तो 17 मासूम बच्चों को बंधक बनाकर आरोपी ने क्या हासिल करना चाहा? घटना के कई पहलू धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं और तस्वीर जितनी खौफनाक है उतनी ही जटिल भी.
पुलिस और पड़ोसियों की शुरुआती जानकारी के मुताबिक रोहित आर्या नाम का शख्स पिछले चार-पांच दिनों से इलाके में बच्चों के ऑडिशन ले रहा था. गुरुवार सुबह करीब 10 बजे आरए स्टूडियो (RA Studio) में लगभग 100 बच्चे ऑडिशन देने पहुंचे थे. रोहित ने ज्यादातर बच्चों को बाहर भेज दिया, लेकिन लगभग 15-20 बच्चों को अंदर ही रोक लिया. बाद में पुलिस अभिलेखों में यह संख्या 17 बताई गई. जब दोपहर 1 बजे तक बच्चे घर नहीं लौटे तो घबराए माता-पिता ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने तुरंत रेड लगाई और इलाके की कड़ी घेराबंदी की. शुरुआती बातचीत में रोकने-सरेंडर करने के लिए कहा गया, लेकिन आरोपी ने बातचीत की शर्त रखी, जिन्होंने न तो पैसे मांगे और न कोई सीधी मनी डिमांड रखी.
वीडियो में क्या कहा
घटना के बीच रोहित ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया, जिसमें उसने साफ कहा कि वह आतंकवादी नहीं है और उसकी मांगें कोई पैसा वसूलने वाली नहीं है, बल्कि वह कुछ लोगों से बात करना चाहता है. उसने कहा कि उसे अपनी बात न सुने जाने के कारण यह कदम उठाना पड़ा और वह ‘नैतिक’ मांगों की बात कर रहा है. वीडियो में उसने चेतावनी भी दी कि कोई आक्रामक कदम उसकी और बच्चों की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है.
60-70 लाख रुपये खर्च कर दिए
पकड़े जाने से पहले रोहित ने यह भी दावा किया कि उसने वर्षों पहले राज्य सरकार की कुछ परियोजनाओं में पैसों का निवेश किया था. खासकर नागपुर में चलाए गए एक स्वच्छता अभियान के लिए मंजूर किए गए फंड को लेकर उसे नुकसान हुआ. उसकी तहरीर के अनुसार उसने करोड़ों रुपये लगाए थे; जब फंड नहीं मिला तो वह नाराज हुआ और उसने कई बार प्रदर्शन भी किए. बताया जा रहा है कि उसने आजाद मैदान में भी विरोध किया था. रोहित का कहना था कि उसने खुद पर 60-70 लाख रुपये खर्च कर दिए थे और बाकी फंड नहीं मिला, इसलिए वह अपनी आवाज़ इस तरह से उठाना चाहता था कि सरकार तक उनकी बात पहुंचे.
रेस्क्यू ऑपरेशन: QRT और पुलिस की रणनीति
मामले की संजीदगी को देखते हुए मुंबई पुलिस की क्विक रेस्पॉन्स टीम (QRT) और स्थानीय थाने की टीम ने मिलकर ऑपरेशन चलाया. पुलिस सूत्रों के अनुसार, बच्चों को स्टूडियो की ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर पर अलग-अलग रखा गया था. ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने पहले बाथरूम के रास्ते अंदर दाखिल होकर बच्चों की लोकेशन पक्की की और फिर क्रमिक तरीके से उन्हें बचाया.
जब पुलिस ने आरोपी से सख्ती से सरेंडर करने को कहा, तो रोहित ने एयर गन निकालकर पुलिस पर फायरिंग की. जवाबी कार्रवाई में QRT ने भी फायरिंग की; इसके बाद रोहित सीने में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुआ. उसे अस्पताल ले जाया गया जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया. हालांकि शुरुआती रिपोर्टों में पुलिस ने उसे गंभीर रूप से घायल बताया था. पुलिस ने मौके से एक एयर गन और एक संदिग्ध हथियार जब्त किया है; फॉरेंसिक जांच चल रही है कि हथियार असली थे या नकली.
बच्चे सुरक्षित
सौभाग्य से, सारे बच्चे सुरक्षित पाए गए और उन्हें परिवारों के हवाले कर दिया गया. परिजनों में गम और आक्रोश दोनों दिखे. किसी ने पूछा कि ऑडिशन का तरीका क्या था, किसी ने निहित उद्देश्य पर सवाल उठाए. सोशल मीडिया पर भी मामला गरमा गया; कई लोग इसे फिल्म ‘A Thursday’ जैसी घटना कह चुके हैं, मगर पुलिस का कहना है कि फिलहाल वास्तविक कारणों की जांच जारी है और किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सबूतों पर गौर किया जाएगा.
क्यों नहीं मांगे पैसे और फिर बंधक बनाए?
यहां सबसे अहम बिंदु यही है: आरोपी ने बार-बार कहा कि उसकी माँगें आर्थिक नहीं थीं और वह संवाद चाहता था. शुरुआती जांच में यह बात उभरकर आई कि उसकी नाराजगी सरकारी परियोजनाओं और बंटे हुए फंड को लेकर थी — वह चाहता था कि कोई उसको सुने और उसकी बात सरकार तक पहुंचे. क्या यही व्यक्तिगत हताशा इतनी मजबूती से उभरी कि उसने बच्चों को बंधक बनाकर सरकार और प्रशासन का ध्यान खींचने का ख़ौफ़नाक तरीका अपनाया? या इसके पीछे कोई और कारण, नेटवर्क या मानसिक अस्थिरता भी है — यह सब जांच में सामने आएगा.
आगामी कार्रवाई और जांच
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की फॉरेंसिक, डिजिटल और व्यवहारिक जांच तेज़ी से जारी है. आरोपी की पृष्ठभूमि, उसके पिछले आंदोलनों, नागपुर के दावों की सत्यता, और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की पड़ताल की जा रही है. साथ ही बच्चों के तनाव, परिवारों की सहायता और मामले की संवेदनशील प्रकृति को देखते हुए साइकोलॉजिकल काउंसलिंग भी आयोजित की जा रही है.



